Friday, 20 June 2014

Short Poetry (tried hard to write but not upto the mark)

सुबह की किरणों में अपने स्वप्ने बोया,
न जाने कब यह धुंद में खोया,
स्वप्नों को खोजने का प्रयास करता रहा,
वर्षो बाद भी उसमें तुम्ही को पाया।